बीजेपी के ख़राब प्रदर्शन को लेकर बड़ा बखेड़ा,आखिर क्या चाहता है हाई कमान

लोकसभा चुनाव में बीजेपी का प्रदर्शन बहुत अच्छा नहीं रहा. खासकर उत्तर प्रदेश में. वह सिर्फ 33 सीटें ही जीत पाई. इस प्रदर्शन के बाद यूपी बीजेपी नेतृत्व पर सवाल उठ रहे हैं. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ निशाने पर हैं. पार्टी के कई नेता खुलकर बयान दे रहे हैं. लेकिन इन सबके बीच योगी आदित्यनाथ के पास एक मौका भी है और वो मौका है
उपचुनाव. जब नतीजे आपके पक्ष में होते हैं तो सब कुछ अच्छा लगता है, लेकिन जब नतीजे आपके खिलाफ होते हैं तो खामियां और कमजोरियां सामने आने लगती हैं. कुछ ऐसा ही यूपी बीजेपी में हो रहा है. पार्टी लोकसभा चुनाव में राज्य में सिर्फ 33 सीटें ही जीत पाई. इतना खराब प्रदर्शन कैसे हुआ, इसे लेकर पार्टी में चर्चा चल रही है. पार्टी के कुछ नेता मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व पर सवाल उठा रहे हैं. जो नेता पहले दबी जुबान में बोलते थे, वे अब खुलकर सामने आ रहे हैं. राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि मुख्यमंत्री और दोनों डिप्टी सीएम के बीच सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है. कहा तो यह भी जा रहा है कि दोनों उपमुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की बैठकों से नदारद रहते हैं।
ये बातें बताती हैं कि लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद योगी आदित्यनाथ कमजोर पड़ गए हैं। लेकिन पार्टी में उठ रहे विरोध के सुरों के बीच योगी आदित्यनाथ के पास अपनी ताकत दिखाने का मौका भी है। वह आगामी विधानसभा उपचुनाव में अपनी ताकत दिखा सकते हैं। प्रदेश में 10 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होने हैं। फिलहाल इनमें से 5 सीटें एनडीए और 5 सीटें सपा के खेमे में हैं।
अगर बीजेपी इन 10 सीटों पर अच्छा प्रदर्शन करती है तो जाहिर तौर पर योगी आदित्यनाथ को ताकत मिलेगी और खुलकर अपने विचार रखने वाले विरोधी भी काफी हद तक शांत हो जाएंगे। जिन सीटों पर उपचुनाव होने हैं उनमें फूलपुर, खैर, गाजियाबाद, मझवां, मीरापुर, मिल्कीपुर, करहल, कटेहरी और कुंदरकी और सीसामऊ शामिल हैं। सीसामऊ को छोड़कर बाकी 9 सीटों के विधायक लोकसभा चुनाव जीतकर सांसद बन चुके हैं, जबकि सीसामऊ सीट सपा नेता इरफान सोलंकी की सदस्यता रद्द होने से खाली हुई है। सीएम योगी आदित्यनाथ भी जानते हैं कि उपचुनाव विरोधियों को शांत करने का अच्छा मौका होता है। यही वजह है कि वह एक्शन में हैं।
उन्होंने बुधवार को मंत्रियों की बैठक भी बुलाई है। सीएम योगी चुनाव की तैयारियों को लेकर मंत्रियों से फीडबैक लेंगे। इससे पहले सीएम योगी ने 30 जून को भी बैठक की थी, जिसमें उन्होंने मंत्रियों को उपचुनाव में ड्यूटी सौंपी थी। सपा के किले में सेंध लगाना चुनौती जिन 10 सीटों पर उपचुनाव हो रहे हैं, उनमें से 5 सपा का किला मानी जाती हैं। ये सीटें करहल, कुंदरकी, कटहरी, सीसामऊ और मिल्कीपुर हैं। सपा प्रमुख अखिलेश यादव करहल से विधायक हैं। वह अब सांसद बन चुके हैं। वह कन्नौज से जीतकर लोकसभा पहुंचे हैं। वहीं, मिल्कीपुर सीट अयोध्या के अंतर्गत आती है। अवधेश प्रसाद यहां से 9 बार विधायक रह चुके हैं। उनके सांसद बनने के बाद यह सीट खाली हुई है।
कठारी अंबेडकरनगर की सीट है। यहां से सपा के लालजी वर्मा विधायक थे। वह अंबेडकरनगर लोकसभा सीट से सांसद बन चुके हैं। कुंदरकी सीट मुरादाबाद के अंतर्गत आती है। यह मुस्लिम बहुल है। इसे सपा का गढ़ माना जाता है। जियाउर्रहमान वर्क यहां से विधायक थे, लेकिन इस बार वह संभल लोकसभा सीट से जीतकर सांसद बन गए हैं।
'अपनों' को संभालना भी चुनौती
हालांकि, उपचुनाव से पहले योगी आदित्यनाथ को यूपी बीजेपी में सबकुछ ठीक करना होगा। उन्हें 'अपनों' को संभालना होगा। उन नेताओं पर ध्यान देना होगा, जिनके बयान नुकसान पहुंचा सकते हैं। संगठन और सरकार के बीच चीजों को ठीक करना होगा। ऐसा इसलिए क्योंकि डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने यूपी बीजेपी कार्यसमिति में कहा था कि संगठन सरकार से ऊपर है। कोई भी व्यक्ति या सरकार संगठन से बड़ी नहीं हो सकती। उन्होंने मजदूरों का भी जिक्र किया और कहा कि जो दर्द आपका है, वही हमारा भी है। केशव मौर्य ने जब यह कहा तो खूब तालियां बजीं, लेकिन उनका संबोधन सवाल भी छोड़ गया।
हालांकि उस बैठक में सीएम योगी ने उपचुनाव के लिए कार्यकर्ताओं को संदेश भी दिया था। सीएम योगी ने कहा कि लोकसभा चुनाव में यूपी की हार अति आत्मविश्वास की हार है। उन्होंने कहा कि विपक्ष ने जिस तरह से सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया, उसका हम मुकाबला नहीं कर सके। उन्होंने नेताओं और कार्यकर्ताओं को यह टास्क भी दिया कि उपचुनाव में सभी को अपनी ताकत दिखानी होगी।
सीएम योगी की साख का सवाल उपचुनाव भाजपा के साथ-साथ योगी आदित्यनाथ की साख का सवाल है। इसमें अगर जीत मिलती है तो यह लोकसभा चुनाव में मिली हार पर मरहम का काम करेगी। इसलिए सीएम योगी ने मंत्रियों से अभी से क्षेत्रों में रहकर हर हाल में जीत दर्ज करने को कहा है। वहीं उपचुनाव की तारीखों के जल्द ही ऐलान की संभावना को देखते हुए भाजपा में टिकटों की भागदौड़ भी शुरू हो गई है। विधायक से सांसद बने नेता अपने परिवार के सदस्य को टिकट दिलाने में जुटे हैं। वहीं कई पूर्व सांसद और विधायक भी टिकट की दौड़ में शामिल हैं।